
प्राचीन भारत के इतिहास और धर्मग्रंथों में कई ऐसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है, जो आज के समय में असामान्य लग सकती हैं। इन्हीं में से एक थी ‘नियोग’ परंपरा। महाभारत काल में यदि किसी स्त्री का पति संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होता था या उसका निधन हो जाता था, तो वंश को आगे बढ़ाने के लिए नियोग की व्यवस्था अपनाई जाती थी।
इस प्रथा में किसी योग्य पुरुष या ऋषि के माध्यम से संतान प्राप्त की जाती थी, लेकिन जन्म लेने वाली संतान को कानूनी और सामाजिक रूप से महिला के पति या उसके कुल का ही माना जाता था।
महाभारत काल में ‘नियोग’ परंपरा क्या थी? कैसे पति के बिना भी होती थी संतान उत्पत्ति
क्या था नियोग का अर्थ?
‘नियोग’ का शाब्दिक अर्थ है — विशेष उद्देश्य से नियुक्त करना।
धर्मग्रंथों के अनुसार, यह व्यवस्था मुख्य रूप से:
- वंश परंपरा बनाए रखने
- राज्य या कुल के उत्तराधिकारी सुनिश्चित करने
- सामाजिक संतुलन बनाए रखने
के लिए अपनाई जाती थी।
यह प्रथा सामाजिक और धार्मिक स्वीकृति के साथ, महिला की सहमति से होती थी। इसे अनैतिक नहीं माना जाता था, बल्कि विशेष परिस्थितियों में इसे उचित समझा जाता था।

महाभारत काल में ‘नियोग’ परंपरा क्या थी? कैसे पति के बिना भी होती थी संतान उत्पत्ति
सत्यवती और महर्षि वेदव्यास
महाभारत में रानी सत्यवती का उल्लेख प्रमुख रूप से मिलता है। विवाह से पहले उन्होंने ऋषि पराशर से एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर महर्षि वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए और महाभारत के रचयिता बने।
बाद में जब सत्यवती के पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई, तब हस्तिनापुर के सिंहासन पर उत्तराधिकारी का संकट खड़ा हो गया। तब सत्यवती ने वेदव्यास को बुलाकर अपनी बहुओं अंबिका और अंबालिका से नियोग के माध्यम से संतान उत्पन्न करने का आग्रह किया।
- अंबिका से धृतराष्ट्र
- अंबालिका से पांडु
- एक दासी से विदुर
का जन्म हुआ।

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पांडु, कुंती और माद्री का प्रसंग
राजा पांडु को एक शाप के कारण संतान उत्पन्न करने में असमर्थता थी। ऐसे में उन्होंने अपनी पत्नियों कुंती और माद्री को नियोग की अनुमति दी।
कुंती के पुत्र:
- धर्मराज (यम) से युधिष्ठिर
- वायु से भीम
- इंद्र से अर्जुन
कुंती को विवाह से पहले सूर्य के आह्वान से कर्ण भी प्राप्त हुए थे।
माद्री के पुत्र:
- अश्विनीकुमारों से नकुल और सहदेव
इस प्रकार पांडवों का जन्म नियोग व्यवस्था के माध्यम से हुआ माना जाता है।

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महाभारत काल में ‘नियोग’ परंपरा क्या थी? कैसे पति के बिना भी होती थी संतान उत्पत्ति
अन्य ग्रंथों में नियोग
नियोग का उल्लेख केवल महाभारत तक सीमित नहीं है। वैदिक साहित्य, पुराणों और कुछ अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी इस प्रथा का जिक्र मिलता है।
रामायण काल
कुछ ग्रंथों में यह संकेत मिलता है कि राजा दशरथ के पुत्रों का जन्म भी विशेष धार्मिक अनुष्ठान और व्यवस्था के माध्यम से हुआ था, जिसे कुछ विद्वान नियोग से जोड़कर देखते हैं।
पद्मपुराण के प्रसंग
- राजा शिवि की रानी
- राजा द्रुमिल की पत्नी
इन कथाओं में भी वंश वृद्धि हेतु नियोग जैसी व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
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नियोग से जन्मी संतान की स्थिति
नियोग से जन्मी संतान को पूरी तरह वैध और सामाजिक रूप से स्वीकार्य माना जाता था।
- संतान का अधिकार पति या कुल को ही मिलता था
- जन्म देने वाले पुरुष का सामाजिक दावा नहीं होता था
- समाज में इसे अनैतिक नहीं माना जाता था
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क्यों समाप्त हुई नियोग प्रथा?
समय के साथ सामाजिक और नैतिक मूल्यों में बदलाव आया।
- विवाह संस्था को अधिक पवित्र और एकनिष्ठ माना जाने लगा
- शुद्धता और नैतिकता की नई अवधारणाएं मजबूत हुईं
- पति-पत्नी संबंध को विशेष महत्व दिया गया
इन परिवर्तनों के कारण नियोग प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गई।
महाभारत काल में ‘नियोग’ परंपरा क्या थी? कैसे पति के बिना भी होती थी संतान उत्पत्ति
निष्कर्ष
नियोग प्रथा प्राचीन भारतीय समाज की एक सामाजिक व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य वंश परंपरा को बनाए रखना था। आज के संदर्भ में यह परंपरा असामान्य प्रतीत हो सकती है, लेकिन उस समय की सामाजिक संरचना और आवश्यकताओं के अनुसार इसे मान्यता प्राप्त थी।
महाभारत और अन्य ग्रंथों में वर्णित ये प्रसंग उस युग की सामाजिक सोच और व्यवस्थाओं को समझने का एक माध्यम हैं।
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